रविवार, 20 सितंबर 2026

Bal Mukundam ( महर्षि मार्कंडेय और बाल मुकुंद की अद्भुत लीला )



ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

बहुत प्राचीन काल की बात है। महर्षि भृगु के वंश में एक महान तपस्वी ऋषि हुए, जिनका नाम था मार्कंडेय। बाल्यकाल से ही उनका मन सांसारिक सुखों में नहीं लगता था। जब दूसरे बालक खेल-कूद और भौतिक सुखों में अपना समय बिताते, तब मार्कंडेय का मन वेदों के अध्ययन, मंत्र-जप, ध्यान और भगवान के चिंतन में लगा रहता। जैसे-जैसे उनकी आयु बढ़ती गई, वैसे-वैसे उनके भीतर परम सत्य को जानने की इच्छा भी और प्रबल होती गई।

एक दिन उन्होंने निश्चय किया कि अब उनका जीवन केवल भगवान की प्राप्ति के लिए होगा। वे पुष्पभद्रा नदी के तट पर चले गए और वहीं कठोर तपस्या करने लगे। उन्होंने अपनी इंद्रियों को वश में किया, भोजन और निद्रा पर नियंत्रण किया और अपने मन को संसार के विषयों से हटाकर भगवान के चरणों में स्थिर कर दिया।

दिन बीतते गए, महीने बीतते गए, वर्ष बीतते गए और देखते ही देखते युगों के समान लंबा समय बीतने लगा। लेकिन मार्कंडेय ऋषि अपनी तपस्या से तनिक भी विचलित नहीं हुए। उनका शरीर तपस्या के तेज से प्रकाशित होने लगा और उनका मन भगवान के ध्यान में इतना स्थिर हो गया कि बाहरी संसार की कोई भी वस्तु उन्हें आकर्षित नहीं कर पाती थी।

उनकी तपस्या की चर्चा तीनों लोकों में होने लगी। जब देवराज इंद्र को यह समाचार मिला कि मार्कंडेय ऋषि अत्यंत प्रबल तपस्या कर रहे हैं, तो उनके मन में चिंता उत्पन्न हुई। इंद्र ने सोचा कि कहीं यह ऋषि अपनी तपस्या के बल से ऐसा वरदान न प्राप्त कर लें जिससे स्वर्ग के उनके पद को संकट हो जाए। इसलिए उन्होंने मार्कंडेय की तपस्या भंग करने का प्रयास किया।

इंद्र ने कामदेव को भेजा। उसके साथ वसंत ऋतु, अप्सराएँ, गंधर्व और अनेक दिव्य शक्तियाँ भी गईं। मार्कंडेय ऋषि के आश्रम के आसपास अचानक ऐसा वातावरण बना दिया गया मानो स्वयं वसंत उतर आया हो। चारों ओर फूल खिल उठे, सुगंधित हवाएँ बहने लगीं, मधुर संगीत गूंजने लगा और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। कामदेव ने अपने पुष्पबाण चलाए।

लेकिन मार्कंडेय ऋषि का मन भगवान में इतना स्थिर था कि इन सबका उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। न उन्हें संगीत सुनाई दिया, न नृत्य ने आकर्षित किया और न कामदेव के बाण उनके मन को विचलित कर सके। वे उसी प्रकार ध्यान में बैठे रहे जैसे कोई पर्वत तूफान के बीच भी अपनी जगह से नहीं हिलता।

कामदेव और उसके सभी साथी अंततः असफल होकर लौट गए।

मार्कंडेय ऋषि की ऐसी अटूट तपस्या और भक्ति से भगवान अत्यंत प्रसन्न हुए। एक दिन उनके आश्रम में अचानक दिव्य प्रकाश फैल गया। वातावरण में ऐसी शांति छा गई जैसी पहले कभी नहीं हुई थी। ऋषि ने अपनी आँखें खोलीं तो उनके सामने दो दिव्य पुरुष खड़े थे—नर और नारायण।

उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी था। उनके मुख पर ऐसी शांति थी कि उन्हें देखते ही मार्कंडेय ऋषि का हृदय प्रेम और श्रद्धा से भर गया। वे तुरंत अपने आसन से उठे और दोनों के चरणों में दंडवत प्रणाम किया। उन्होंने उनका स्वागत किया, आसन अर्पित किया, चरणों का पूजन किया और हाथ जोड़कर भगवान की स्तुति करने लगे।

मार्कंडेय ऋषि बोले, “हे प्रभु! आपकी कृपा के बिना आपके दर्शन संभव नहीं हैं। आप ही इस संसार के आधार हैं। आप ही जीवों को चेतना देते हैं। आप ही इस सृष्टि को धारण करते हैं। ब्रह्मा, शिव, इंद्र और समस्त देवता भी आपकी शक्ति से ही अपने-अपने कार्य करते हैं। जो जीव आपकी शरण में आ जाता है, उसके लिए संसार का भय समाप्त हो जाता है।”

ऋषि की भक्ति देखकर भगवान प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा, “हे मार्कंडेय! तुम्हारी तपस्या और भक्ति से हम अत्यंत प्रसन्न हैं। तुम कोई भी वरदान मांग सकते हो।”

भगवान स्वयं सामने खड़े थे। मार्कंडेय चाहें तो धन मांग सकते थे, राज्य मांग सकते थे, लंबी आयु मांग सकते थे या कोई दिव्य शक्ति प्राप्त कर सकते थे। लेकिन उनके हृदय में इन चीजों के लिए कोई इच्छा नहीं थी।

उन्होंने भगवान की ओर देखा और हाथ जोड़कर कहा, “हे प्रभु! मुझे संसार की कोई वस्तु नहीं चाहिए। मेरी केवल एक जिज्ञासा है। मैं आपकी उस अद्भुत माया को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ, जिसके कारण जीव इस संसार को वास्तविक मानकर मोह में पड़ जाता है। मैं आपकी माया को अपने नेत्रों से देखना चाहता हूँ।”

भगवान मुस्कुराए। उन्होंने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली और कहा कि उनकी यह इच्छा पूर्ण होगी।

भगवान वहाँ से अंतर्धान हो गए और मार्कंडेय ऋषि पुनः अपनी साधना में लीन हो गए। लेकिन अब उन्हें पता नहीं था कि भगवान का दिया हुआ वरदान किस रूप में उनके सामने आने वाला है।

एक दिन संध्या के समय मार्कंडेय ऋषि पुष्पभद्रा नदी के तट पर बैठे भगवान का ध्यान कर रहे थे। वातावरण अत्यंत शांत था। सूर्य अस्त होने वाला था। पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे और नदी का जल धीरे-धीरे बह रहा था।

अचानक वातावरण बदलने लगा।

आकाश में घने काले बादल छा गए। तेज हवाएँ चलने लगीं। वृक्षों की शाखाएँ जोर-जोर से हिलने लगीं। बादलों की गर्जना से पूरा आकाश कांप उठा। बिजली बार-बार चमकने लगी। कुछ ही क्षणों में ऐसी भयंकर वर्षा शुरू हुई मानो आकाश स्वयं टूटकर धरती पर गिर रहा हो।

मार्कंडेय ऋषि ने चारों ओर देखा। वर्षा रुकने का नाम नहीं ले रही थी। नदियाँ उफान पर आ गईं। जल चारों ओर फैलने लगा। देखते ही देखते भूमि जल में डूबने लगी।

पहले आश्रम के आसपास की भूमि डूबी। फिर वृक्ष डूब गए। फिर पर्वत और वन दिखाई देना बंद हो गए। जल बढ़ता ही चला गया। आकाश और पृथ्वी के बीच का अंतर मिट गया।

कुछ ही समय में चारों ओर केवल जल दिखाई दे रहा था।

मार्कंडेय ऋषि ने देखा कि जिस संसार को वे इतने वर्षों से देखते आए थे, वह जैसे समाप्त हो चुका है। न नगर दिखाई दे रहे थे, न पर्वत, न वन, न जीव-जंतु। सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश भी जैसे कहीं खो गया था।

संपूर्ण सृष्टि एक अथाह समुद्र में बदल चुकी थी।

मार्कंडेय ऋषि उस प्रलय के जल में अकेले रह गए।

वे कभी विशाल लहरों के साथ ऊपर उठते, कभी भयंकर भंवरों में नीचे चले जाते। तेज हवाएँ उन्हें एक दिशा से दूसरी दिशा में बहा ले जातीं। उन्हें न कोई भूमि मिलती, न कोई आश्रय। न कोई मनुष्य दिखाई देता, न कोई जीव, न कोई परिचित स्थान।

धीरे-धीरे उन्हें भूख, प्यास, थकान और भय सताने लगा।

उन्होंने चारों ओर देखा और मन ही मन कहा, “हे प्रभु! यह कैसी लीला है? मेरा आश्रम कहाँ चला गया? पृथ्वी कहाँ चली गई? पर्वत, नदियाँ और वन कहाँ चले गए? क्या यही आपकी माया है?”

लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।

वे उस अनंत जलराशि में भटकते रहे।

कभी उन्हें दूर कोई प्रकाश दिखाई देता और वे उसकी ओर बढ़ते, लेकिन पास पहुँचने पर वह गायब हो जाता। कभी उन्हें लगता कि सामने भूमि है, लेकिन वह केवल लहरों का भ्रम निकलता। कभी उन्हें लगता कि शायद अब इस समुद्र का अंत आ गया है, लेकिन सामने फिर अनंत जल दिखाई देता।

समय बीतता गया।

इतना लंबा समय बीत गया कि उसके सामने मनुष्य के वर्षों की कोई कीमत ही नहीं रह गई। मार्कंडेय ऋषि की चेतना इस अद्भुत माया से पूरी तरह अभिभूत हो गई।

जिस ऋषि ने अपनी तपस्या से कामदेव को भी पराजित कर दिया था, वही ऋषि अब भगवान की माया के सामने स्वयं को असहाय अनुभव कर रहा था।

लेकिन भगवान की लीला अभी समाप्त नहीं हुई थी।

एक दिन, जब मार्कंडेय ऋषि उस अनंत जलराशि में भटक रहे थे, तभी उन्हें दूर एक अद्भुत प्रकाश दिखाई दिया।

वे उस प्रकाश की ओर बढ़े।

धीरे-धीरे उन्हें एक ऊँची भूमि दिखाई दी। उस भूमि पर एक विशाल बरगद का वृक्ष खड़ा था।

चारों ओर प्रलय का जल था, लेकिन वह बरगद हरा-भरा था। उसकी शाखाएँ फैली हुई थीं। उसके पत्ते चमक रहे थे। ऐसा लगता था मानो विनाश के बीच भी जीवन का कोई रहस्य सुरक्षित हो।

मार्कंडेय ऋषि आश्चर्य में पड़ गए।

उन्होंने सोचा, “जब पूरी पृथ्वी जल में डूब चुकी है, तब यह वृक्ष कैसे बचा हुआ है?”

वे धीरे-धीरे उस वृक्ष के पास पहुँचे।

तभी उनकी दृष्टि उसकी एक शाखा पर पड़ी।

और जो दृश्य उन्होंने देखा, उसे देखकर वे वहीं रुक गए।

बरगद के एक हरे पत्ते पर एक नन्हा-सा बालक लेटा हुआ था।

वह बालक अत्यंत सुंदर था।

उसका शरीर गहरे नीलवर्ण का था, जैसे वर्षा से भरे हुए मेघ का रंग। उसका मुख कमल के समान सुंदर था। उसकी आँखें बड़ी और शांत थीं। उसके घुंघराले बाल उसके मस्तक पर सुंदरता से बिखरे हुए थे।

चारों ओर प्रलय का भयंकर समुद्र था, लेकिन उस बालक के चेहरे पर किसी प्रकार का भय नहीं था।

वह पूरी तरह निश्चिंत होकर बरगद के पत्ते पर लेटा हुआ था।

उसने अपने छोटे-से पैर को अपने हाथों से पकड़ रखा था और अपने पैर के अंगूठे को अपने मुख में रखकर बड़े प्रेम से चूस रहा था।

मार्कंडेय ऋषि उस दृश्य को देखते ही जैसे सब कुछ भूल गए।

उनकी थकान समाप्त हो गई।

उनका भय समाप्त हो गया।

उनका मन उस बालक के सौंदर्य में डूब गया।

उनके भीतर प्रश्न उठा—

“यह कौन है? प्रलय के बीच यह बालक कहाँ से आया? यह बरगद का वृक्ष कैसे बचा? और यह बालक इस विनाश के बीच इतना शांत कैसे है?”

ऋषि धीरे-धीरे उस बालक के निकट जाने लगे।

बालक ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें उठाकर उनकी ओर देखा।

उसकी दृष्टि में ऐसी करुणा थी कि मार्कंडेय ऋषि का हृदय पिघल गया।

उन्हें लगा कि वे इस बालक को पहले से जानते हैं।

मानो उनकी आत्मा कह रही हो—

“यही वह है जिसे तुम वर्षों से खोज रहे थे।”

मार्कंडेय ऋषि उस बालक को निहारते रहे।

तभी बालक ने धीरे से श्वास अंदर खींची।

और अचानक एक ऐसी घटना हुई जिसकी कल्पना मार्कंडेय ऋषि ने कभी नहीं की थी।

बालक की श्वास के साथ ऋषि को एक अदृश्य शक्ति ने अपनी ओर खींच लिया।

उन्होंने स्वयं को रोकना चाहा, लेकिन वे उस दिव्य श्वास के साथ बालक के भीतर प्रवेश कर गए।

एक क्षण पहले वे प्रलय के समुद्र के सामने थे।

अगले ही क्षण वे एक विशाल, प्रकाशमय संसार में पहुँच गए।

उन्होंने अपनी आँखें खोलीं।

उनके सामने पूरा ब्रह्मांड था।

आकाश था।

पृथ्वी थी।

पर्वत थे।

समुद्र थे।

नदियाँ थीं।

सूर्य था।

चंद्रमा था।

तारे थे।

देवता थे।

मनुष्य थे।

पशु-पक्षी थे।

वन थे।

नगर थे।

ऋतुएँ थीं।

जीवन अपनी पूरी गति से चल रहा था।

मार्कंडेय ऋषि विस्मित होकर चारों ओर देखने लगे।

उन्होंने सोचा, “यह कैसे संभव है? मैं तो अभी प्रलय के समुद्र में था। पूरी पृथ्वी जल में डूब चुकी थी। फिर यह संसार यहाँ कैसे मौजूद है?”

वे आगे बढ़े।

उन्होंने अनेक लोक देखे। उन्होंने पर्वतों और नदियों को देखा। उन्होंने मनुष्यों को अपने कर्म करते हुए देखा।

और फिर उनकी दृष्टि एक ऐसे स्थान पर पड़ी जिसे देखकर वे स्तब्ध रह गए।

वह उनका अपना आश्रम था।

वही पुष्पभद्रा नदी।

वही तट।

वही वातावरण।

वही स्थान जहाँ वे भगवान का ध्यान करते थे।

मार्कंडेय ऋषि की आँखें खुली की खुली रह गईं।

उन्होंने स्वयं से कहा—

“मेरा आश्रम तो प्रलय में डूब गया था। मैं स्वयं उस प्रलय के समुद्र में भटक रहा हूँ। फिर यह आश्रम यहाँ कैसे हो सकता है?”

तभी उन्हें भगवान की माया का रहस्य समझ आने लगा।

जिस संसार को वे बाहर वास्तविक समझते हैं, वही संसार भगवान के भीतर भी मौजूद है।

जिसे वे अनंत मानते हैं, वह भी भगवान की सत्ता पर निर्भर है।

जिसे वे अपने से अलग समझते हैं, वह भी उसी परम सत्ता की शक्ति से प्रकट है।

उन्होंने अनुभव किया कि भगवान संसार के भीतर भी हैं और संसार से परे भी।

वही परम सत्ता संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण करती है और वही एक नन्हे बालक के रूप में बरगद के पत्ते पर विश्राम कर सकती है।

मार्कंडेय ऋषि इस अद्भुत दृश्य को समझने का प्रयास कर ही रहे थे कि बालक ने अपनी श्वास बाहर छोड़ी।

और उसी क्षण ऋषि फिर उस दिव्य श्वास के साथ बाहर आ गए।

उन्होंने आँखें खोलीं।

वे फिर उसी प्रलय के समुद्र में थे।

सामने वही बरगद का वृक्ष था।

बरगद के पत्ते पर वही नन्हा नीलवर्ण बालक लेटा हुआ था।

वह अब भी अपने पैर के अंगूठे को मुख में रखे हुए था।

मार्कंडेय ऋषि अब समझ चुके थे।

यह कोई साधारण बालक नहीं है।

यह स्वयं भगवान हैं।

वही भगवान जिनके भीतर उन्होंने संपूर्ण ब्रह्मांड का दर्शन किया था।

वही भगवान जिन्होंने उन्हें अपनी माया का अनुभव कराया था।

वही भगवान जिनकी खोज में उन्होंने इतनी लंबी तपस्या की थी।

ऋषि का हृदय प्रेम से भर गया।

उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

बालक ने उनकी ओर देखा।

उसके मुख पर एक अत्यंत मधुर मुस्कान आई।

उस मुस्कान में ऐसा प्रेम था कि मार्कंडेय ऋषि अपने आपको रोक नहीं सके।

वे उस बालक को अपने हृदय से लगाने के लिए आगे बढ़े।

उन्होंने अपने हाथ फैलाए।

वे उसे अपनी गोद में लेना चाहते थे।

लेकिन जैसे ही वे उसे स्पर्श करने वाले थे—

भगवान अचानक अंतर्धान हो गए।

उसी क्षण बरगद का वृक्ष भी गायब हो गया।

प्रलय का समुद्र भी समाप्त हो गया।

अंधकार मिट गया।

और मार्कंडेय ऋषि ने स्वयं को अपने उसी आश्रम में पाया।

पुष्पभद्रा नदी पहले की तरह बह रही थी।

आकाश स्वच्छ था।

वृक्ष खड़े थे।

पक्षियों का कलरव सुनाई दे रहा था।

मानो कुछ हुआ ही न हो।

मार्कंडेय ऋषि कुछ क्षण तक शांत बैठे रहे।

उनके मन में जो कुछ घटा था, उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन था।

उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं।

उनके सामने फिर वही दृश्य आ गया—

अनंत प्रलय का समुद्र।

उसके बीच खड़ा बरगद का वृक्ष।

बरगद के पत्ते पर लेटा हुआ नन्हा नीलवर्ण बालक।

उसकी मधुर मुस्कान।

उसकी श्वास।

और उस श्वास के भीतर समाया हुआ संपूर्ण ब्रह्मांड।

तब मार्कंडेय ऋषि का सारा मोह समाप्त हो गया।

उन्होंने समझ लिया कि संसार को केवल आँखों से देखकर उसके सत्य को नहीं जाना जा सकता।

जीव संसार को स्थायी मानकर उसमें मोहग्रस्त होता है। वह शरीर को अपना समझता है, धन को अपना समझता है, संबंधों को स्थायी समझता है और इसी मोह में जन्म-मरण के चक्र में भटकता रहता है।

लेकिन भगवान की माया ने मार्कंडेय को स्वयं दिखा दिया कि जो संसार इतना विशाल और स्थायी दिखाई देता है, वह भी भगवान की इच्छा से प्रकट और विलीन होता है।

ऋषि ने हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम किया और बोले—

“हे प्रभु! अब मैं समझ गया हूँ। आप ही इस सृष्टि के मूल हैं। आपसे ही सब कुछ प्रकट होता है और अंततः आपमें ही सब कुछ विलीन हो जाता है। आप इस संसार के भीतर भी हैं और इससे परे भी। आप अनंत ब्रह्मांड के स्वामी होकर भी एक छोटे से बालक के रूप में बरगद के पत्ते पर लेट सकते हैं। आपकी महिमा का अंत कोई नहीं जान सकता।”

मार्कंडेय ऋषि की आँखों से प्रेम के आँसू बहने लगे।

उनके हृदय में अब किसी वस्तु की इच्छा नहीं थी।

न उन्हें धन चाहिए था।

न यश।

न शक्ति।

न स्वर्ग।

न कोई भौतिक सुख।

उनके हृदय में केवल भगवान की भक्ति थी।

वे बार-बार भगवान का नाम लेने लगे—

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।”

उनका मन भगवान के चरणों में पूरी तरह स्थिर हो गया।

समय बीतता गया और मार्कंडेय ऋषि अपनी साधना में लगे रहे।

एक दिन भगवान शिव और माता पार्वती आकाश मार्ग से जा रहे थे। उन्होंने देखा कि एक महान ऋषि गहरी समाधि में बैठे हैं। माता पार्वती ने भगवान शिव से उस ऋषि के दर्शन करने की इच्छा व्यक्त की।

भगवान शिव मार्कंडेय ऋषि के पास गए।

ऋषि इतनी गहरी समाधि में थे कि उन्हें बाहरी संसार का कोई भान नहीं था। तब भगवान शिव ने अपनी योगशक्ति से उनके हृदय में स्वयं को प्रकट किया। ऋषि की समाधि टूटी और उन्होंने आँखें खोलीं।

सामने भगवान शिव और माता पार्वती को देखकर वे तुरंत उठे और दोनों को प्रणाम किया।

भगवान शिव मार्कंडेय की तपस्या, ज्ञान और भक्ति से प्रसन्न हुए।

उन्होंने कहा—

“हे महर्षि! तुम्हारी भक्ति से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम कोई भी वरदान मांग सकते हो।”

मार्कंडेय ऋषि ने हाथ जोड़कर कहा—

“हे महादेव! मुझे संसार की किसी वस्तु की इच्छा नहीं है। मैंने भगवान की माया का दर्शन कर लिया है। अब मेरी एक ही इच्छा है कि मेरे हृदय में भगवान के प्रति भक्ति कभी समाप्त न हो। मुझे भगवान के भक्तों के प्रति प्रेम प्राप्त हो। मेरे भीतर ज्ञान, वैराग्य और सत्य की भावना बनी रहे।”

भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्हें दीर्घायु, यश, ज्ञान और आध्यात्मिक वैभव का आशीर्वाद दिया।

भगवान शिव और माता पार्वती वहाँ से चले गए।

मार्कंडेय ऋषि फिर अपनी साधना में लीन हो गए।

लेकिन अब उनकी साधना पहले जैसी नहीं थी।

अब उसमें केवल तपस्या नहीं थी।

उसमें प्रेम था।

अब उनके लिए नदी का बहता हुआ जल केवल जल नहीं था—उन्हें उसमें भगवान की शक्ति दिखाई देती थी।

आकाश की विशालता उन्हें भगवान की अनंतता का स्मरण कराती थी।

पर्वतों की स्थिरता उन्हें भगवान के आधार का अनुभव कराती थी।

और जब भी वे अपनी आँखें बंद करते, उन्हें वही नन्हा बालक दिखाई देता—बरगद के पत्ते पर शांत भाव से लेटा हुआ, अपने पैर के अंगूठे को मुख में रखे हुए और अपने मधुर चेहरे से पूरी सृष्टि को प्रेम से निहारता हुआ।

तब मार्कंडेय ऋषि के हृदय से एक ही भाव निकलता—

“हे बाल मुकुंद! जिस संसार को मैं बाहर खोज रहा था, वह आपके भीतर था। जिस सत्य को मैं वर्षों की तपस्या से खोज रहा था, वह मेरे सामने एक नन्हे बालक के रूप में मुस्कुरा रहा था। आपने मुझे दिखा दिया कि यह संपूर्ण जगत आपकी शक्ति से चलता है और अंततः आपकी ही शरण में विश्राम पाता है।”

और वे भगवान का नाम जपते हुए प्रेम में मग्न हो जाते—

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

यही मार्कंडेय ऋषि की सबसे बड़ी प्राप्ति थी।

उन्होंने भगवान की माया देखी, लेकिन माया में फँसे नहीं।

उन्होंने प्रलय देखा, लेकिन भय में नहीं रहे।

उन्होंने संपूर्ण ब्रह्मांड देखा, लेकिन अहंकार में नहीं आए।

उन्होंने भगवान को बालक के रूप में देखा और अंततः अपने हृदय को उन्हीं के चरणों में समर्पित कर दिया।

इसलिए बरगद के पत्ते पर लेटे उस नन्हे बाल मुकुंद की कथा केवल एक अद्भुत दर्शन की कथा नहीं है।

यह उस क्षण की कथा है जब एक महान ऋषि को यह अनुभव हुआ कि जिसे संसार समझकर हम बाहर खोजते हैं, उसका वास्तविक आधार स्वयं भगवान हैं।

वही भगवान सृष्टि के आरंभ में हैं।

वही सृष्टि के अंत में हैं।

वही प्रलय के अथाह जल में हैं।

वही एक नन्हे बालक के रूप में बरगद के पत्ते पर हैं।

और वही हमारे हृदय में भी विराजमान हैं।

जय श्री हरि।
जय बाल मुकुंद।
जय श्री कृष्ण।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।


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